गीता(188)
||तामादिशक्तिम् शिरसा नमामि||
महानतम शरणागति का उपदेश देकर, गीता की शिक्षा को समाप्त करते हुए, श्री भगवान् अर्जुन से कहते हैं:-
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति॥
यं इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि॥
"तुझे यह कभी भी न तपरहित मनुष्य से, न भक्तिरहित मनुष्य से और न जो सुनने को इच्छुक न हो, उससे कहना चाहिए तथा जो मुझ में दोषदृष्टि रखता है, उससे नहीं कहना चाहिए। जो पुरुष मुझमें परम प्रेम करके इस परम गोपनीय को मेरे भक्तों में कहेगा, वह मुझे ही प्राप्त होगा– इसमें सन्देह नहीं है। उससे बढ़कर मेरा प्रिय करने वाला मनुष्यों में कोई नहीं है तथा पृथ्वी पर उससे बढ़कर मेरा प्रिय कोई दूसरा होगा भी नहीं।" (अध्याय 18, श्लोक 67 से 69 तक)
ये तीन श्लोक जिस शिक्षा के विषय में कहे गये हैं, उसे प्रायः सम्पूर्ण गीता की शिक्षा अर्थात् गीता-शास्त्र समझ लिया जाता है; जो सही नहीं है। इन श्लोकों की भाषा से ऐसा नहीं लगता। गीता की शिक्षा, कलेवर में संक्षिप्त अवश्य है, किन्तु अपने अर्थ-गौरव में अनन्ततः विस्तारित है– जो आस्तिकों के लिए तो अत्यन्त कल्याणकारी है ही, उसमें नास्तिकों को भी आस्तिक बना सकने की अमित शक्ति है। गीता-शास्त्र– निस्सन्देह रहस्यपूर्ण है तथा कुछ अंशों में गोपनीय भी, परन्तु इसे परम गोपनीय कहना सही नहीं हो सकता। गीता की शिक्षा तो सभी श्रेयकामियों के लिये है– योगियों, ज्ञानियों, तपस्वियों आदि सभी के लिए। यह केवल भक्तों के लिए, नहीं है। जबकि श्री भगवान्, इन तीन श्लोकों में सन्दर्भगत शिक्षा को– परम गोपनीय और अपने भक्तों के लिए– बता रहे हैं। इससे स्पष्ट होता है कि ये तीन श्लोक, अवश्य ही ऐसी शिक्षा के लिए कहे गये हैं– जो सम्पूर्णतः अथवा अधिकांशतः भक्तों के लिए ही है और जिसे अभक्तों द्वारा गलत समझ लिए जाने की सम्भावना है तथा जिसे गलत समझे जाने पर, हानि की संभावना भी है। विचारणीय है कि श्लोक 64 से 66 में बताये गये शरणागति-योग को– श्री भगवान् सभी गोपनीयों से भी अधिक गोपनीय बताये हैं तथा यह भी समझाये हैं कि वह शरणागति-योग उनके इष्ट भक्तों के लिए ही है। उस योग को समझाने के क्रम में वे बताये हैं कि वे शरणागत को सभी पापों से मुक्त कर देंगे– जिसे गलत समझ लेना निश्चय ही अनर्थकारी है। वे उस योग को समझाते हुए, सभी धर्मों को त्याग देने के लिए भी कहे हैं– जो सामान्य स्थिति में अवश्य ही गलत और हानिकर ही है। इस प्रकार स्पष्ट है कि उपर्युक्त तीन श्लोकों को– उन्होंने श्लोक 64 से 66 में उक्त शिक्षा के लिए ही कहा है, श्लोक 63 तक उक्त शेष गीता-शास्त्र के लिए नहीं।
यहाँ श्री भगवान् की उक्ति का आशय यह है कि श्लोक 64 से 66 में दी गयी शिक्षा अर्थात् महत्तम शरणागति-योग को–
कभी भी तपरहित अथवा भक्तिरहित मनुष्य से नहीं कहना चाहिए, क्योंकि यह योग तपस्वियों और भक्तों के लिए ही उपयोगी है तथा अन्यों के लिए यह अनुपयोगी अथवा अहितकर है। जो इसे सुनने के लिए इच्छुक न हों, उनसे भी इस योग को नहीं कहना चाहिए; क्योंकि वे इसका तात्पर्य समझ नहीं पायेंगे और तब उनकी हानि हो सकती है। जो श्री भगवान् में दोष-दृष्टि रखते हैं, जैसे नास्तिक आदि– उनसे भी इस योग को नहीं कहना चाहिए, क्योंकि वे न तो भक्त हैं और न निकट भविष्य में भक्त हो पायेंगे; उल्टे वे दृढ़ भक्तों को भी कुतर्क द्वारा विचलित कर सकते हैं।
श्री भगवान् कहते हैं कि उनके प्रति परम प्रेमवश, जो पुरुष इस परम गोपनीय महत्तम शरणागति-योग को– भक्तों से कहेगा, वह निस्सन्देह उन्हें ही प्राप्त होगा। स्वाभाविक है कि ऐसा पुरुष– श्री भगवान् का भक्त ही हो सकता है, जो महत्तम शरणागति-योग के रहस्य को समझ चुका हो। श्री भगवान् कहते हैं कि उनके भक्तों से इस शरणागति-योग को बताने वाला पुरुष– उनकी वैयक्तिक सत्ता-सत्य के लिए, सर्वाधिक प्रिय है अर्थात् उनके लिए उस पुरुष से अधिक प्रिय कोई भी नहीं है। विचारणीय है कि श्री कृष्ण-मुख से, उनका वैयक्तिक सत्य ही उपदेश दे रहा है। वे कहते हैं कि पृथ्वी पर, उस पुरुष से बढ़कर उनका प्रिय कोई होगा भी नहीं। उक्ति का आशय स्वाभाविक एवं स्पष्ट है। यहाँ स्पष्ट होता है कि श्री पुरुषोत्तम अपने अंश जीव से– उसकी परम शरणागति से अधिक कुछ भी नहीं चाहते। उपर्युक्त तीन श्लोकों को, श्री भगवान्– महत्तम शरणागति-योग की अति महत्ता और भक्तों के लिये उसकी अति उपयोगिता– को समझाने के लिए ही कहें हैं।
इसके बाद श्री भगवान् अर्जुन से कहते हैं :-
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः॥
श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः।
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्॥
"जो पुरुष हम दोनों के इस धर्म्य संवाद को पढ़ेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञान-यज्ञ से पूजित होऊँगा– ऐसा मेरा मत है। जो मनुष्य श्रद्धायुक्त और दोष-दृष्टि से रहित होकर इसका श्रवण भी करेगा, वह भी पापों से मुक्त होकर उत्तम कर्म करने वालों के श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होगा। (अध्याय 18, श्लोक 70 एवं 71)
उक्ति अपने आप में स्पष्ट है। धर्म्य का आशय है– धर्म-संगत तथा धर्माचरण के योग्य। श्री भगवान् इस गीता-शास्त्र को पढ़ने-सुनने का महात्म्य बता रहे हैं। इस उक्ति से गीता-शास्त्र की महत्ता स्पष्ट होती है।
इसके बाद श्री भगवान् अर्जुन से पूछते हैं:-
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा।
कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय॥
"हे पार्थ! क्या इस गीता-शास्त्र को तू ने एकाग्र चित्त से सुना? हे धनञ्जय! क्या तेरा अज्ञानजनित मोह नष्ट हुआ?" (अध्याय 18, श्लोक 72)
प्रश्न अपने आप में स्पष्ट है। गुरु का यह दायित्व होता है कि वह शिष्य से पूछ ले कि वह समझ गया या नहीं? श्री भगवान् उसी दायित्व का निर्वाह कर रहे हैं। गीता में यह उनका अन्तिम वचन है।
श्री भगवान् के प्रश्न का उत्तर देते हुए, अर्जुन उनसे कहता है:-
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्ध्वा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।
स्थितोऽसि गतसंदेहः करिष्ये वचनं तव॥
"हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है, स्मृति प्राप्त हो गयी है, संशयरहित होकर स्थित हूँ, आप की आज्ञा का पालन करूँगा।" (अध्याय 18, श्लोक 73)
उक्ति अपने आप में स्पष्ट है। गीता को समझ लेने का फल है– मोह का नष्ट हो जाना, स्मृति प्राप्त होना कि वह परमेश्वर का सनातन अंश है, ज्ञात ईश्वरेच्छा का पालन करना,अहंता का क्षीणतर होते जाना और प्रत्येक स्थिति को ईश्वर की कृपा मानना आदि। श्री कृष्ण और अर्जुन का यह संवाद यहाँ पूरा हो गया।
कृष्णार्जुन संवाद समाप्त हो जाने पर, सञ्जय ने धृतराष्ट्र से कहा :-
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः।
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्॥
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेद्गुह्यमहं परम्।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्॥
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्।
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः॥
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः।
विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः॥
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥
"इस प्रकार मैं ने श्री वासुदेव और महात्मा अर्जुन के इस अद्भुत रोमांचकारी संवाद को सुना। व्यास की कृपा से मैं इस परम गोपनीय योग (महत्तम शरणागति-योग) को कहते हुए (अर्जुन के प्रति) योगेश्वर श्री कृष्ण से प्रत्यक्ष सुना है। हे राजन्! श्री केशव और अर्जुन के इस कल्याणकारी अद्भुत संवाद को पुनः-पुनः स्मरण करके बार-बार हर्षित हो रहा हूँ। हे राजन्! श्री हरि के उस अत्यन्त विलक्षण रूप को भी पुनः-पुनः स्मरण करके मेरे चित्त में महान् आश्चर्य होता है और मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ। जहाँ योगेश्वर श्री कृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धर अर्जुन है; वहाँ पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है– ऐसा मेरा मत है।" (अध्याय 18, श्लोक 74 से 78 तक)
सञ्जय का उद्गार स्पष्ट है। उनका यह उद्गार महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे सम्पूर्ण कृष्णार्जुन संवाद के– कृष्ण और अर्जुन के अतिरिक्त एकमात्र द्रष्टा और श्रोता थे। उन्हें महर्षि व्यास से दूरदर्शन एवं दूरश्रवण की दिव्यशक्ति प्राप्त थी। सत्य और परमेश्वर की विजय सुनिश्चित है।
यहीं श्रीमद्भगवद्गीता पूरी होती है।
||ॐ तत्सत् ॐ||तामादिशक्तिम् शिरसा नमामि||
----क्रमशः गीता(189)/ सार-संदेश (एक)।
