मर्म गीता 187




 गीता(187)

||तामादिशक्तिम् शिरसा नमामि||

गीता में श्री भगवान् के अन्तिम उपदेश के अनुसार– यदि भक्त-साधक सभी धर्मों को छोड़कर, सब प्रकार से एकमात्र पुरुषोत्तम परमेश्वर के प्रति शरणागत हो जाय; तो वे ही कृपा करके, उसे सभी पापों से मुक्त कर देंगे तथा उसे अपने परमपद में उठा ले जायेंगे। अतः श्री भगवान् के प्रति शरणागत हो जाने पर, भक्त-साधक को शोक-रहित हो जाना चाहिए। इसे भलीभाँति समझ लेने के बाद, मनुष्य श्री भगवान् के प्रति शरणागत होकर रहने अथवा उनके प्रति शरणागत नहीं होने के लिए; पूरी तरह स्वतन्त्र है। आशय यह है कि परमेश्वर के प्रति आत्म-समर्पण और शरणागति– मनुष्य के लिए– उसकी अपनी सीमाबद्ध अहंता से परमेश्वर की अनन्त महत्ता तक उठने का सुनिश्चित उपाय है। यदि मनुष्य अपनी दिव्य संभावनाओं को उपलब्ध होना चाहता है, तो उसे श्री भगवान् के समक्ष निरावृत, नग्न, निर्भार एवं निश्छल होकर उपस्थित होना होगा। उनकी ओर अभिमुख होकर अपने हृदय और मन के सभी दरवाजों को– उन्हीं प्रियतम के लिए खोलकर, उन्हें अपने सम्पूर्ण अस्तित्व में रम जाने देने पर; मनुष्य की जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है। यह चरम शरणागति ही– मनुष्य को सँभाल कर और उसे सभी पापों से मुक्त कर, उसे अधिकतम पूर्णता तक ले जाने के लिए पर्याप्त है। ऐसा हो जाने पर, शेष सब कुछ स्वयं श्री भगवान् सँभालते हैं। वे कहते हैं कि 'सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज'– ताकि वे सर्वसमर्थ परमेश्वर– अपने भक्त के पाप-पुण्य, ज्ञान-अज्ञान, न्याय-अन्याय, सामर्थ्य-असामर्थ्य आदि को अपने हाथ में लेकर– उनके उलझे हुए अपूर्ण रूपों का परित्याग करके, उन सब को विश्वातीत पवित्रता तथा अमोघ सामर्थ्य में रूपान्तरित कर देंगे। तात्पर्य यह है कि तब श्री भगवान् उस भक्त के क्षुद्र हर्ष-विषाद एवं संघर्षपूर्ण सुख-दुःख को, अपने अकल्पनीय आनन्द में रूपान्तरित कर लेंगे। इसीलिए वे कहते हैं कि 'अहं त्वा सर्व पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि'।

      श्लोक 61 से 66 तक, जो कुछ भी श्री भगवान् समझाये हैं– उससे स्पष्ट होता है कि मनुष्य के लिए, सर्वोच्चश्रेय-प्राप्ति का एकमात्र अन्तिम द्वार है– सम्पूर्ण शरणागति। मनुष्य चाहे किसी भी मार्ग से जाय, उसे पुरुषोत्तम परमेश्वर तक पहुँचने के लिए, अन्ततः इस द्वार से गुजरना ही होगा। गीता में इस अध्याय के श्लोक 60 तक, जो विस्तृत ज्ञान दिया गया है, वह एक महान योग की सुविकसित साधन-प्रणाली है; जो सर्वोच्च ज्ञान एवं सर्वोच्च सत्य से सर्वथा सुसंगत है। जिसमें मनुष्य की सभी क्षमताओं– कर्म, ज्ञान, संकल्प, ध्यान एवं भक्ति आदि सभी को, परमेश्वर को समर्पित कर देने की युक्ति सिखायी गयी है। गीतोक्त साधना के सर्वोच्च शिखर पर पहुँच जाने पर– संसार-कर्म, पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म आदि से ऊपर उठ चुका तथा ममता से सर्वथा रहित हो चुका महान साधक– अपनी अत्यन्त क्षीण अहंता से युक्त होता है। यह अत्यन्त ऊँची अवस्था है, जहाँ विरले साधक ही पहुँच पाते हैं। तब वह ज्ञानदीप्त-प्रेमी होता है। उस स्थिति में उसे प्रत्यक्ष होता है कि उसके और अशेष भूतों के अन्तःस्थित उसका अंशी परमेश्वर ही सभी भूतों को अपनी माया-शक्ति से यंत्रारूढ़ की भाँति घुमा रहे हैं। इस परम सत्य के प्रत्यक्ष होने पर, वह ज्ञानदीप्त-प्रेमी सब प्रकार से परमेश्वर के प्रति शरणागत हो जाता है। यह शरणागति ही पुरुषोत्तम परमेश्वर में प्रवेश के लिए अन्तिम द्वार है। उस शरणागति के सम्भव हो जाने पर, जीव को कुछ भी नहीं करना होता। तब पुरुषोत्तम परमेश्वर स्वयं ही कृपा करके उस जीव को परमपद में प्रतिष्ठित कर देते हैं। यहाँ जीव की अहंता विसर्जित हो जाती है। यही सर्वोच्च श्रेय की उपलब्धि है।

      यहाँ यह प्रश्न उपस्थित होता है कि जब शरणागत को स्वयं पुरुषोत्तम श्री भगवान् ही परमपद में ले जाते हैं, तो फिर मनुष्य– साधना की लम्बी शृंखला से होकर उपर्युक्त अत्युच्च अवस्था तक आरोहित हो पाने के लिए प्रयास एवं प्रतीक्षा क्यों करे? क्यों न वह यथास्थिति में ही पुरुषोत्तम परमेश्वर के शरणागत होकर निश्चिन्त हो जाय तथा अपनी सभी समस्याओं से निजात पा ले? क्या यह सम्भव है? क्या अपात्र एवं पापी जीव के भी शरणागत हो जाने पर, पुरुषोत्तम परमेश्वर उस पर कृपा करके स्वयं ही परमपद में ले जायेंगे? श्री भगवान् का स्पष्ट उत्तर है– हाँ, यह सम्भव है। उनका यह उत्तर श्लोक 65 एवं 66 में निहित है। यदि जीव पुरुषोत्तम परमेश्वर के प्रति पूरी तरह शरणागत हो जाय, तो वे उसे यथाविकसित अवस्था में ही स्वीकार कर लेंगे तथा उस पर कृपा करके उसे सभी पापों से मुक्त कर स्वयं ही उसे परमपद में ले जायेंगे। मनुष्य को उनके प्रति– केवल पूरी तरह शरणागत होने की जरूरत है। इसके अतिरिक्त कोई शर्त नहीं। किसी अन्य साधना की आवश्यकता नहीं। किसी अन्य पात्रता की जरूरत नहीं। किन्तु उनके प्रति सम्पूर्ण शरणागति सम्भव कैसे हो? इस प्रश्न का उत्तर भी श्लोक 65 एवं 66 में निहित है। इन दो श्लोकों में– परम रहस्य, महानतम योग और उस योग हेतु अमोघ साधना– तीनों निहित हैं। श्लोक 65 एवं 66 में निहित श्री भगवान् के आशय को, संक्षेप में इस प्रकार समझने का प्रयास किया जा सकता है–

         सर्वप्रथम एकमेव सर्वनियन्ता परमेश्वर को अपना प्रियतम अर्थात् इष्ट बनाना होगा। उनके व्यक्तिकभाव की सत्यता के प्रति दृढ़ विश्वास रखकर, उनसे अपना सम्बन्ध स्थापित करना होगा। उनकी सर्वव्यापकता, सर्वमयता, सर्वपरता एवं सर्व-नियन्तृत्व पर दृढ़ विश्वास रखना होगा। यह मानना होगा कि सभी शक्तियाँ और सभी गतियाँ उनकी हैं और उनके संकल्प से हैं। सम्पूर्ण विश्व उनका है और उनके लिए है। दृढ़तापूर्वक उनको दया, क्षमा और करुणा का अनन्त सागर समझना होगा। यथा सम्भव व्यक्तिगत कामना और आसक्ति से मुक्त रहकर, जगत् और जीवन की यथास्थिति को– उनका प्रसाद और उनकी इच्छा समझकर, उसे मन एवं हृदय से स्वीकार करना होगा। यह समझ लेना होगा कि उनको प्राप्त कर लेना ही सर्वोच्च श्रेय है, जो निश्चय ही सम्भव है। दृढ़ संकल्प पूर्वक जीवन-मरण के चक्र से मुक्त होने के लिये तथा सर्वोच्च श्रेय अर्थात् पुरुषोत्तम परमेश्वर को उपलब्ध होने के लिए– सच्चे मन से दृढ़ विश्वासपूर्वक प्रार्थना करनी होगी। सत्कर्म, धर्म, कर्त्तव्य और सदाचार की भावना से– नियत कर्मों को करते रहना होगा। उपर्युक्त प्रकार से जीवन व्यतीत करते हुए– श्लोक 65 में उक्त साधना-चतुष्टय को अपना जीवन-सूत्र बनाना होगा तथा उन साधनों को– निरन्तर विकसित करते हुए, शुद्धतर एवं उत्कृष्टतर बनाने का प्रयास करना होगा। तात्पर्य यह है कि अपने मन को पुरुषोत्तम श्री भगवान् में नियुक्त करना होगा, उनका सच्चा एवं अनन्य भक्त होना होगा, निष्कामभाव से उनका भजन-पूजन करना होगा तथा अत्यन्त विनत मन एवं भावपूर्ण हृदय से उन्हें बार-बार नमन करना होगा। दृढ़ विश्वास रखना होगा कि इस साधना-चतुष्टय द्वारा, वह निश्चय ही सर्वोच्च श्रेय को प्राप्त हो जायेगा।

      इस साधना-चतुष्टय में सफलता हेतु– प्रारम्भ में पुरुषोत्तम श्री भगवान् के प्रतीक, प्रतिमा एवं साकार नाम-रूप आदि का सम्बल उपयोगी हो सकता है। इस साधना-चतुष्टय के विकास-क्रम में, साधक स्वतः ही पूर्णरूप से निष्काम और पूरी तरह अनासक्त हो जायेगा। इसके पश्चात् वह उनके परमात्म-तत्त्व को जान लेगा, जो ज्ञानियों का परब्रह्म है तथा उसे उनकी समग्रता का सच्चा ज्ञान भी स्वतः स्पष्ट हो जायेगा। उसे उनकी अनन्त सत्ता और अनन्त शक्ति का बोध भी स्वतः हो जायेगा। तब वह स्पष्टतः जान पायेगा कि वे अन्तर्यामी परमेश्वर ही सभी जीवों को अपनी माया-शक्ति से यन्त्रारूढ़ की भाँति घुमाते रहते हैं और वही उसके प्रियतम पुरुषोत्तम हैं। तब वह भक्त-साधक– पुरुषोत्तम परमेश्वर के प्रति शरणागत हुआ, उपर्युक्त साधना-चतुष्टय में तल्लीन रहता है। किन्तु तब भी वह धर्माचरण के प्रति आग्रह के कारण– पापाचरण से चिन्तित एवं भयभीत रहता है। इसीलिए वह पुरुषोत्तम श्री भगवान् के प्रवेश-द्वार पर पहुँचकर भी, उस द्वार में प्रवेश नहीं कर पाता। उसकी शरणागति अधूरी रहती है। इसीलिए श्री भगवान् कह रहे हैं कि वह सभी धर्मों को छोड़कर, उनके शरणागत हो जाय तथा निश्चिन्त रहे– केवल शरणागत हो जाने के कारण ही, वे उसे सभी पापों से मुक्त कर देंगे। इस तर्कातीत परम रहस्य को जानकर तथा इस आश्वासन पर दृढ़ विश्वास रखकर– वह भक्त सर्वभावेन पुरुषोत्तम श्री भगवान् के शरणागत हो जायेगा। इस प्रकार पुरुषोत्तम के प्रति सम्पूर्ण शरणागति घटित हो जाती है, जो उनमें प्रवेश का एकमात्र अन्तिम प्रवेश-द्वार है। इसके साथ ही वह भक्त-जीव अपनी क्षीण अहंता के साथ परमपुरुष पुरुषोत्तम में प्रवेश कर जायेगा। अर्थात् पुरुषोत्तम स्वयं ही उसे परमपद में उठा लेंगे। यही सर्वोच्च श्रेय की उपलब्धि है। यहीं गीता का उपदेश पूर्ण होता है।

                       ----------क्रमशः गीता(188)।

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