
असह्य अपमान, किन्तु संयम अनिवार्य
॥तामादिशक्तिम् शिरसा नमामि॥
सनातन भारतीय चिन्तन को आत्मसात् किए बिना, परम सत्य परमेश्वर के माँ काली-स्वरूप और शिव-पार्वती-स्वरूप की महिमा और रहस्य को समझ पाना असम्भव है। कुछ दिन हुए, लीना मणिमेकलाई नाम की एक महिला द्वारा सनातन भारतीयता को नीचा दिखाने तथा भारत के विकास-रथ को अवरुद्ध करने के कुत्सित उद्देश्य से माँ काली और शिव-पार्वती के स्वरूपों का अपमान करने की चेष्टा की गई। निश्चय ही माँ काली या शिव-पार्वती का अपमान असम्भव है, किन्तु जो हुआ; वह सनातनियों के लिए हृदय को व्यथित करनेवाला अवश्य है।
अभी तक सनातनियों द्वारा कोई उग्र उद्वेलन प्रदर्शित नहीं हुआ है। क्षमा, करुणा, मानवता आदि को सर्वोच्च धर्म तथा अपने देश को माँ समझनेवाले सनातनी, ऐसी ओछी हरकतों से उद्वेलित हो भी नहीं सकते। वे देश और देशवासियों को हानि पहुँचाये बिना, शान्तिपूर्वक लोकतांत्रिक विरोध का मार्ग ही चुनेंगे।
कुछ सनातनी चाहते हैं कि सनातनियों को भी कट्टर और असहिष्णु होना चाहिए। किन्तु यह सम्भव नहीं है, क्योंकि सनातन मत सत्य को सर्वोपरि मानता है तथा सत्य का खोजी होने के लिए प्रेरित करता है। कट्टर या असहिष्णु व्यक्ति तो सत्य को समझ ही नहीं सकता। इसीलिए सनातन मत अपनी मान्यताओं के बारे में संशय, तर्क और विचार-विमर्श की अनुमति देता है; ताकि वैचारिक जड़ता के प्रति आत्मार्पित होने से बचा जा सके। कट्टरता और असहिष्णुता न होने के कारण ही, सनातनियों को दीर्घकाल तक ग़ुलामी का दंश झेलना पड़ा तथा अनेकों मन्दिरों के ध्वंस की पीड़ा को सहना पड़ा। इसी कमी के कारण, आज भी सनातनी मान्यताओं की हँसी उड़ाई जाती है। किन्तु यह कमी ही सनातनियों की संजीवनी शक्ति भी है।
कट्टरता का अर्थ है, अपनी मान्यताओं के बारे में विचार-विमर्श को सर्वथा अमान्य कर देना। यह अपनी वैचारिक सत्ता को मान्यताओं की कारा में क़ैद कर, पशु बन जाने जैसा है। किन्तु कट्टरता में प्रचण्ड तमोगुणी एकता का बल भी होता है। इसीलिए सम्प्रदाय को बढ़ाने और ताक़तवर बनाने के लिए, इसे अत्यंत उपयोगी समझा जाता है। कई सम्प्रदायों में, इसी आशय से कट्टरता को रोपित किया गया है तथा उसके निरंतर पोषण की व्यवस्था भी की गयी है। किन्तु अप्राकृतिक होने के कारण, कट्टरता का बल केवल लड़ाई, मार-काट, उपद्रव आदि के अवसर पर ही क्रियाशील होता है। कट्टर मनुष्य कट्टरता के पक्ष में, अन्धी आक्रामकता से युक्त और दुविधा से मुक्त होता है। कट्टरता में आत्मनाश का बीज होता है। वह अनिवार्यतः अहंकारिता, असहिष्णुता, क्रूरता, ध्वंस, नृशंसता, विनाश आदि से होते हुए आत्मनाश के प्रति प्रेरित रहती है।
प्राचीन भारत के महर्षिगण कट्टरता में निहित "आत्मनाश की ओर प्रेरित बुराइयों" के बारे में जानते थे। इसलिए उनके द्वारा हमेशा कट्टरता से बचने की शिक्षा दी गई।
आजकल सनातनियों के समक्ष धर्म, संस्कृति और देश को बचाने की चुनौती खड़ी हो रही है। विदेशी शक्तियों, स्वदेशी जयचंदों और कट्टर मजहबी उन्मादियों को उनके उद्देश्यों में सफल नहीं होने देने की चुनौती है। सनातनियों को स्मरण रखना चाहिए कि उन्हें उनके प्राचीन ऋषियों द्वारा अनिवार्य हिंसा से बचने या अनिवार्य युद्ध से पलायन की शिक्षा नहीं दी गई है। किन्तु वर्तमान समय में कट्टरता और उग्रता के तमोगुणी चकाचौंध से अभिभूत होकर, उन्मादी विरोध की ओर बढ़ना, ऋषियों की शिक्षा का त्याग करने जैसा ही होगा। अतः इस समय धैर्य, संयम और शान्ति के साथ उग्रता-रहित किन्तु सशक्त विरोध का मार्ग अपनाना ही उचित रहेगा। सनातनियों को चाहिए कि वे "जातीय भेद-भाव से ऊपर उठकर अपनी एकता को सुदृढ़ करें, शक्ति संचित करते रहें, अपने धर्म पर अडिग रहें, अपने मौलिक स्वभाव से विचलित हुए बिना प्रत्येक गलत का सशक्त विरोध करें, सनातन संस्कृति के समर्थक राजनेताओं और राजनैतिक दलों को पूरा समर्थन दें तथा समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए सरकार पर दबाव बनाए रखें।"
॥ॐ तत्सत् ॐ॥