बिजली संशोधन विधेयक और निजीकरण का वित्तीय पैकेज लाने की तैयारी में केंद्र सरकार, कर्मचारी बोले– मंजूर नहीं
नई दिल्ली। केंद्र सरकार बिजली क्षेत्र में बड़े सुधारों की दिशा में एक बार फिर कदम बढ़ाने की तैयारी में है। सरकार आगामी सत्र में बिजली संशोधन विधेयक के साथ-साथ निजीकरण को बढ़ावा देने वाला एक वित्तीय पैकेज लाने पर विचार कर रही है। इस प्रस्ताव का उद्देश्य बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) की वित्तीय हालत सुधारना और निजी निवेश को आकर्षित करना बताया जा रहा है। हालांकि, इस कदम को लेकर बिजली कर्मचारियों और उनके संगठनों में भारी नाराजगी देखी जा रही है।
सरकारी सूत्रों के अनुसार, प्रस्तावित विधेयक के तहत बिजली वितरण व्यवस्था में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने, निजी भागीदारी को आसान बनाने और घाटे में चल रही डिस्कॉम को आर्थिक सहारा देने की योजना है। इसके लिए राज्यों को एक विशेष वित्तीय पैकेज देने का भी खाका तैयार किया जा रहा है, जिससे निजीकरण या सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल को लागू किया जा सके।
वहीं, बिजली कर्मचारियों के संगठनों ने इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया है। कर्मचारी नेताओं का कहना है कि यह विधेयक और वित्तीय पैकेज दरअसल बिजली क्षेत्र के पूर्ण निजीकरण की दिशा में एक और कदम है। उनका आरोप है कि इससे कर्मचारियों की नौकरी की सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी और आम उपभोक्ताओं पर महंगी बिजली का बोझ बढ़ सकता है।
कर्मचारी संगठनों ने साफ शब्दों में कहा है कि वे इस विधेयक को किसी भी हाल में स्वीकार नहीं करेंगे। उनका कहना है कि सार्वजनिक क्षेत्र की बिजली कंपनियों को कमजोर दिखाकर निजी कंपनियों को लाभ पहुंचाने की कोशिश की जा रही है। यदि सरकार ने इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाया, तो देशव्यापी आंदोलन और हड़ताल का रास्ता अपनाया जाएगा।
दूसरी ओर, सरकार का तर्क है कि बिजली क्षेत्र में सुधार जरूरी हैं। बढ़ते घाटे, तकनीकी नुकसान और निवेश की कमी के चलते सुधारों के बिना व्यवस्था को टिकाऊ बनाना मुश्किल है। सरकार का दावा है कि नए विधेयक से सेवाओं की गुणवत्ता बेहतर होगी और उपभोक्ताओं को बेहतर विकल्प मिलेंगे।
फिलहाल, बिजली संशोधन विधेयक और निजीकरण से जुड़े वित्तीय पैकेज को लेकर सरकार और कर्मचारियों के बीच टकराव की स्थिति बनती नजर आ रही है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक रूप से और अधिक गरमाने की संभावना है।
